सेहतमंद सलाह की समस्या
Seven Rules of Life
- Unknown
Victory has 100 fathers
25/09/2021
| Photo: Twitter |
जॉन एफ़ कैनेडी का नाम सुना होगा। कल शाम से अजाने ही कैनेडी की याद आ रही थी। बराय मेहरबानी सोशल मीडिया।
सबसे छोटी डरावनी कहानी की कथा
| फ़ोटोः प्रभाष के दत्ता |
नॉक
यानी दरवाज़े पर दस्तक अँग्रेज़ी लिटरेचर की सबसे छोटी हॉरर स्टोरी, डरावनी या
भूतिया कहानी मानी जाती है। यह सिर्फ़ दो वाक्यों की कहानी है। इसे अमेरिकी लेखक
फ्रेडरिक ब्राउन ने लिखी। दूसरे विश्व-युद्ध के तीन साल बाद पहली बार प्रकाशित
हुई। अगले ही साल यानी 1949 में यह दोबारा प्रकाशित की गई।
कहानी
कुछ इस तरह है – "द लास्ट मैन ऑन अर्थ सैट अलोन इन अ रूम। देअर वाज़ अ नॉक ऑन द
डोर..."
अर्थात् "संसार का आख़िरी आदमी एक कमरे में अकेला (अकेलेपन में) बैठा है। दरवाज़े पर एक दस्तक होती है..."
कल्पना
करिए कि उस आदनी की जगह आप हैं। भयावह लगता है।
इस
कहानी की प्रेरणा एक और अमेरिकी लेखक थॉमस बेली अल्डरिक की कुछ लाइनें हैं – "कल्पना
करिए कि धरती के मुखरे से सारे मनुष्यों का ख़ात्मा हो गया है। सिर्फ़ एक आदमी बच
गया। कल्पना करिए कि यह आदमी किसी विशाल शहर में है जैसे कि न्यू यॉर्क या फिर
लंदन। कल्पना करिए कि अकेलेपन की इस स्थिति में वह तीसरे या चौथे दिन एक घर में
बैठा है और उसे डोर-बेल की घंटी सुनाई पड़ती है।"
फ़्रेडरिक
ने 1903 में प्रकाशित पॉन्कापॉग पेपर्स में यह लिखा था। प्रथम विश्व युद्ध के 11
साल पहले। चार साल बाद वे चल बसे। मतलब, क़रीब 45 साल बाद फ़्रेडरिक
की ये लाइनें कई वैश्विक त्रासदियों – दो विश्वयुद्ध, स्पॅनिश फ़्लू नाम की एक
भयंकर महामारी, आर्थिक महामंदी – के बाद ब्राउन की डरावनी कथा की प्रेरणा बनी।
ब्राउन
की कहानी की पृष्ठभूमि है कि एलिएन्स, परग्रही ज़ॅन ने धरती पर जीवन समाप्त कर दिया
है। कुछ स्पेसिमेन रखे हैं पार्थिव जीवों के म्यूज़ियम, ज़ू के लिए जो वे अपने
ग्रह पर, संसार में बनाएँगे।
कमरे
में बैठा वो आदमी संयोग से बच गया है। याद करिए, जब आपने दो वाक्यों और तीन
बिन्दुओं (जिसे इलेप्सिस कहते हैं) की ये कहानी पढ़ी तो कल्पना में क्या आया
था।
उस
आदमी की जगह ख़ुद को दो दिन, तीन दिन, एक हफ़्ता रहना क्या भयावह लगा?
अकेलापन,
एकाकीपन की ऊब से पैदा होने वाली निस्सारता भी आई होगी, डर के साथ। विचित्र-सी
स्थिति है यह कल्पना के लिए।
लेकिन
क्या यह ख़्याल आया कि दरवाज़ा किसी महिला ने खटखटया हो?
स्टीरियोटाइप?
लेखक ने तीन बिन्दुओं में डर और संभावना दोनों छोड़ा रखा है। नहीं?
मित्रता का मंत्र, एक जापानी कहानी
जब भी मैं कुछ लिखने को होता हूँ तो मेरी दुविधा होती है: हिंदी या इंग्लिश? ये वाला हिंदी में। वैसे, दिमाग़ में मूल रूप से अँग्रेज़ी में था।
जापान की एक पुरानी सीख है। चढ़ती, बढ़ती उम्र में कहीं से मिली थी। पुराने समय में वहाँ कहते थे कि किसी बेचारे का पेट भरना हो तो उसे मछली दे दो। वो ख़ुश हो जाएगा। संतुष्ट और आनंदित भी। लेकिन वो निर्भर रहेगा
शांतिपाठ, बृहदारण्यक का सामाजिक सौहार्द्य
| (Ducks in Adhwara river, Aahil, Darbhanga. (Photo: Prabhash K Dutta) |
धर्म में मेरी रुचि है। लेकिन मैं शायद धार्मिक नहीं हूँ। यह संबंध जैसा किसी सरकारी दफ़्तर में जाने पर जो आभास होता है उसके विपरीतमूलक है। वहाँ कई कार्मिक होते हैं लेकिन उनमें से कई की कर्म में रुचि नहीं होती। वैसे ही मेरी धर्म में रुचि है लेकिन मैं अमूमन धार्मिक नहीं होता हूँ। इसलिए शांतिपाठ पर लिखना मेरी अधर्मिता है जो धर्म में रुचि की हठधर्मिता से उपजी है।
शांतिपाठ पहले भी कई बार पढ़ा था। इस शनिवार एक बार फिर पढ़ा। कई बार ख़ाली समय काम आ जाता है, अगर मोबाइल फ़ोन छोड़ पाने का जतन कर लिया है तो। पढ़ते ही पटना कॉलेज के दिन और एक-आध सोच याद आ गई। पहले शांतिपाठ के शब्द, जैसा कि मूल उपनिषदों में से एक –- बृहद् अरण्यक (अर्थ, विशाल वनों से संबंधित) –- से मिलता है।
ऊँ पूर्णम् इदम् पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते। पूर्णस्य पूर्णम् आदाय पूर्णम् एव अवशिष्यते।।
ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
मुझे
संस्कृत नहीं आती। इसका शाब्दिक अर्थ आमतौर पर मंत्र को समझाने वाली क़िताबे नहीं
बताती। वे इनकी व्याख्या करती हैं। हम व्याख्या ही समझते हैं। इसमें कई बार मूल
शब्दार्थ छूट जाता है क्योंकि इसे समझाने वाला अपनी समझ ही देने लगता है।
मसलन, हम अक्सर देखते हैं कि लोग महात्मा गाँधी के बारे में (व्याख्या) ख़ूब पढ़ते
हैं, गाँधी को नहीं।
हालाँकि
गाँधी नें धुआँधार लिखा है। तब की राजनीति पर लिखा है तो मूँगफली के उपयोग, लाभ पर
भी लिखा है। गाँधी की व्याख्या पढ़ने वालों को मैंने अक्सर गाँधी के बारे में ग़लत
राय बनाते ही पाया है। जिन्होंने गाँधी को पढ़ा है, वे बेहतर समझते हैं। यही बात
गाँधी के क़ातिल नाथूराम गोडसे के बारे में भी है। गोडसे का बयान क़िताब की शक्ल
में मौजूद है लेकिन लोग किसी की व्याख्या पढ़कर अंदाज़ा लगाते हैं। इसीलिए मेरा
मानना है कि भूख की शमन के बाद समझ की स्वतंत्रता एक मनुष्य का पहला अधिकार है, और
यही पहला कर्तव्य भी है।
इसी
संदर्भ में शांतिपाठ का शब्दार्थ जानना पहली ज़रूरत है। व्याख्या तो फिर भी कहीं
भी मिल सकती है। अपने भीतर भी। चूँकि मुझे संस्कृत नहीं आती, मैंने गीताप्रेस के
एक संस्करण की सहायता ली जो 1960 के दशक में छपी। हम वैसे भी प्राचीनता को
प्रमाणिकता के समकक्ष समझते हैं। अब शांतिपाठ का शब्दार्थ।
ऊँ पूर्णम् इदम् पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते। पूर्णस्य पूर्णम् आदाय पूर्णम् एव अवशिष्यते।।
ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
ऊँ
को कॉस्मिक साउंड, ब्रह्म ध्वनि मानते हैं। कई लोग इसे ईश्वर का आह्वान भी मानते
हैं। मूलतः यह एक अपरिभाषित सार्वभौमिक आध्यात्मिक आह्वानिक ध्वनि है। यह एक
समर्पण भी है। इस शांतिपाठ में मुझे ऐसा ही लगा।
अर्थ
–- वह सब प्रकार से पूर्ण है, यह भी पूर्ण है क्योंकि उस पूर्ण से ही यह पूर्ण
उत्पन्न हुआ है, पूर्ण के पूर्ण को निकाल लेने पर पूर्ण ही बचता है।
यह
है शाब्दिक अर्थ।
वह
इश्वर हो सकता है। परब्रह्म भी कहते है। यह संसार के लिए हो सकता है। हमारे, आपके
लिए हो सकता है। लेकिन तर्क यह है कि यह वह से निकला है। वह पूर्ण है, इसलिए यह भी
पूर्ण है। इनके आपस का संबंध ऐसा है कि उस पूर्ण (वह) से इस पूर्ण (यह) को निकाल
लेने पर भी दोनों पूर्ण ही रहते हैं।
यानी,
वह किसी लोटे का पानी है कि एक गिलास निकाल लिया तो कम दिखने लगा, बल्कि समुद्र है
जहाँ से एक बाल्टी पानी निकाल लेने पर भी दोनों का अपना पूर्ण अस्तित्व है।
हालाँकि, लोटे और समुद्र का बिम्ब शांतिपाठ को समझने का सही चित्र नहीं है। वास्तव
में यह कुछ ऐसा है कि जैसे यह यूनिवर्स हरेक ऐटम से बना है और दोनों ही लगातार
पूर्ण हैं। ऐटम दूसरे ऐटम से मिलकर भी पूर्ण है, और यूनिवर्स का हिस्सा है। नष्ट
होकर भी किसी न किसी रूप में पूर्ण है। एक ऐटम होगा ही। क्वार्क के रूप में भी
अस्तित्व पूर्ण है और यूनिवर्स का हिस्सा है। दोनों पूर्ण हैं।
शांतिपाठ
यही कहता है। मैं, आप, और वे सभी वह के साथ पूर्ण हैं। तीन विधियों से शांति बनी
रहे। इस आह्वान के साथ शांतिपाठ पूरा हो जाता है।
साहित्यक
रूप से शांतिपाठ बृहद् अरण्यक उपनिषद् के पाँचवे अध्याय के प्रथम (शतपथ) ब्राह्मण (वेद् की व्याख्या
करने वाले ग्रंथ) में है। शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद से संबद्ध है। बाद के
ग्रंथों में शांतिपाठ की कई और शब्दावली मिलती है। अलग-अलग पूजा के लिए अलग-अलग
शांतिपाठ। लेकिन प्राचीनता ही प्रामाणिकता को आधार बनाकर बृहद् अरण्यक के शांतिपाठ
को ही मौलिक मान लेते हैं।
सभी
काम से पहले शांतिपाठ की प्रस्तावना की गई है। शायद भारतीय मनीषी ने एक प्रीएंबल
दिया था देश की जनता को जिसके ज़रिए उन्हें इस बात का आभास रहे कि वे एकात्म का
हिस्सा हैं। ऐसा कुछ न करें जिससे किसी को क्लेष हो और शांति भंग हो।
मैं
अगली बार शांतिपाठ सुनूँगा या पढ़ूँगा तो इसका ध्यान रखूँगा। चाहें तो आप भी इस अर्थ में शांतिपाठ को अपना सकते हैं बजाए यह मानने के कि शांतिपाठ करने, कराने से
आपके घर में कोई दूसरा (ईश्वर ही क्यों न हों) शांति ला सकता है या ला सकती है।
मार्टर या शहीद का विरोध क्यों
| India Gate was built to honour 84,000 soldiers who fought and laid down their lives for British India in World War-I and the First Afghan War. (Photo: Prabhash K Dutta) |
कुछ साल पहले की बात है। शब्दों को लेकर पत्रकारों और दूसरे लिखे-पढ़े लोगों में भ्रांतियों पर एक वरिष्ठ मित्र से बात हो रही थी। मुद्दा यह था कि कितने ही सामान्य बोल-चाल के शब्द हम ग़लत रूप में प्रयोग करते हैं। मेरे वरिष्ठ मित्र पत्रकारिता छोड़ चुके थे और इस बात से बहुत चिंतित थे कि पत्रकार जो कि भारत में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने लोग हैं ग़लत तरीक़े से शब्दों का प्रयोग और उच्चारण करते हैं।
उदाहरणों में, मैंने ख़िलाफ़त शब्द का ज़िक्र किया। मुझे थोड़ी हैरानी हुई कि मेरे वरिष्ठ मित्र, जो भाषा के अच्छे जानकार हैं, ने कभी इस बात पर ग़ौर नहीं किया था कि ख़िलाफ़त शब्द का मुख़ालिफ़त से कोई लेना-देना नहीं हैं। ख़िलाफ़त शब्द मजहबी है। ख़लीफ़ा से संबंधित है।
लेकिन टीवी वग़ैरह में मुख़ालिफ़त की जगह अक्सर ख़िलाफ़त का प्रयोग होता रहा है। मैंने न्यूज़रूम में लोगों को यह दलील देते हुए भी सुना है कि चूँकि लोग अब ख़िलाफ़त को मुख़ालिफ़त ही समझते हैं, इसलिए इसी शब्द का प्रयोग करते रहना चाहिए।
इसे ही शायद भाषाविद शब्दों का रूढ़ होना कहते हैं। मैंनेे पहली बार अंग्रेज़ी के रैशनल शब्द के बारे में ऐसा सुना था। कॉलेज़ के दिनों में। मार्टर या शहीद शब्द के रूढ़ होने को लेकर मेरा निजी विरोध बहुत इमोशनल है।
अंग्रेज़ी का शब्द मार्टर (martyr) हिंदी-उर्दू में शहीद है। नेता लोग, और आम जन भी, मार्टर और शहीद शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं। गर्व के साथ। कुछ को तो इतना गर्व है कि जो मार्टर या शहीद शब्द की असली पहचान जानते हैं और देश की सीमा पर या पुलिस ड्यूटी करते हुए अपनी जान गँवाने वाले जवानों, सिपाहियों के लिए मार्टर या शहीद नहीं इस्तेमाल करते, उनसे अदावत करते हैं।
मुझे भारत के सैनिकों, जवानों, सिपाहियों, बहादुरों के लिए शहीद या मार्टर शब्द का प्रयोग इंसल्टिंग, अपमानजनक लगता है।
मार्टर शब्द का अर्थ क्या है?
इसके लिए इसकी शुरुआत को समझना पड़ेगा। ग्रीक-लैटिन मूल से निकला शब्द है मार्टर, जिसका ्सामान्य अर्थ होता था विटनेस, साक्षी। इसका व्यावहारिक अर्थ होता था, रिलीजन यानी मजहब के लिए, उसकी मुख़ालिफ़त करने के बजाय कष्ट या मृत्यु स्वीकार करना।
आम तौर पर डिक्शनरी में मार्टर की परिभाषा कुछ इस तरह से होती है -- "a person who is killed or who suffers greatly for a religion, cause, etc."
उदाहरण में अमूमन यह मिलेगा -- the early Christian martyrsब्रिटानिका एनसाइक्लोपीडिया के मुताबिक़, मार्टर एक व्यक्ति है जो अपने मजहब को नकारने के बजाय स्वैच्छिक रूप से तक़लीफ़ सहते हुए मृत्यु को अपना लेता है। यहूदी मजहब से कई उदाहरण हैं जो प्री-क्रिश्चियन हैं। अब्राहम, आइज़ैक और डैनियल की कथाओं में शहादत का यही भाव है। ये सभी नज़ारथ के जीसस के जन्म के पहले के हैं।
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